shantidham

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गुरुवार, 20 सितंबर 2012

rishi panchmi 2012

         Rishi panchmi aadi aur anadi kal se manate aur nag se juda huwa tyohar hai. aaj ke din vasuki nag ke madhyam se samundra manthan ke kriya ko bhagwan shiv ke madhyam se samjhate huye ese rishi parmpara ka gyan utbhut huwa aur mantra ka navin chintan jo bed se pare par vilakshan shakti liye huye bhagwan shiv ne samundra manthan ke dauran vish pan karte samjhya jo aadi kal ke bad aaj kali kal me manw kalyan w shukh shanti ka wardan huwa.
            aaj ..............

रविवार, 25 जुलाई 2010

स्वामी अनुराज जयंती (२००९)


मानव जीवन अपने आप में ही अमूल्य है और सभी पुरुषार्थ जैसे धर्म ,अर्थ ,काम ,मोक्ष की प्राप्ति आवश्यक है भारतीय ऋचाओ को समझने के लिए चतुर्मुख ब्रम्हा ने चार वेदों की तथा १०८ उपनिषदों की रचना की जो सदगुरु होते है उनमे यह ज्ञान सर्वदा निहित होता है जिसे समझने के लिए ४ गुरु मंडल को समझना होगा जो गुं, गुरुभ्यो नमः ,पं परम गुरुभ्यो नमः ,पं परात्पर गुरुभ्यो नमः ,शं सिद्धश्रमय नमः के रूप में गुंजायमान है परन्तु गुरु को आबद्ध करने के लिए कोई साधना नहीं है गुरु तो स्वयं में शिव है गुरु और शिव में कोई अंतर नहीं होता है इसलिए भी जीवन में ४ शिव परम आवश्यक है जो महाकालेश्वर ,महामृतुन्जय,वैद्यनाथ ,ओंकारेश्वर के रूप में केंद्र बिंदु है

विक्रमादित्य ने इन्हें आधार माना और काल गणनकिया जिसके आधार पर विक्रमसंवत बना महाकालेश्वर की साधना से काल विजय (काल गणना )कीप्राप्ति होती है जिससे संभावित घटना को टला जा सकता है क्योकि किसी भी घटना को घटने के लिए समय और स्थान आवश्यक होप्ता है जिसे "मृत्युर्मे अमृत गमय "कहा गया हैऔर यह तब संभव होगा जब वैद्यनाथ की कृपा प्राप्त होगी जिससे आरोग्य की प्राप्ति और कायाकल्प होता है इसके बाद आवश्यक हो जाता है ध्यान, धारणा ,और समाधी यह तभी संभव हो सकता है जब ओंकारेश्वर की कृपा प्राप्त होगी यही गुरु मंडल का रहस्य है

शास्त्र विदित बात है की भगवान् शिव भी इकार रूपी शक्ति के बिना शव के सामान है ये शक्तिया महाकाली ,महालक्ष्मी ,महासरस्वती है जहाँ महाकाली से शत्रुशमन ,लक्ष्मी से अटूट धन की प्राप्ति होती है और यह तभी संभव है जब हमें महासरस्वती की कृपा प्राप्त हो तब सम्पूर्णता को प्राप्त किया जा सकता है

मानव का सम्बन्ध "प्राणवायु "से प्रकृति के पूर्व से ही सम्बन्ध है जो एक दुसरे के पूरक है श्वास के आवास -प्रवास से प्रकृति में शक्ति का संचरण होता है जो चन्द्र और सूर्य स्वर के माध्यम से होता है परन्तु "ई "रूपी शक्ति अचेत अवस्था में मूलाधार में सोया रहता है इसलिए बिना गुरु के स्पर्श या दीक्षा से इस ज्ञान का जागरण अशंभव है गुरु जब दीक्षा देते है तो ज्ञान का बीजा रोपण होता है बीज धरातल के बिच बोया जाता है बीज बीना प्रकृति में विसर्जित हुए पौध नहीं बनता ठीक उसी तरह शिव अर्थात गुरु दीक्षा देते है तब वो शिवत्व को प्राप्त हो जाता है और उसके पहले स्व कोअर्थात "मै "को विसर्जित करना आवश्यक है मणिपुर में बीजारोपण होता है तब पहले मानव अधोगति में जाता है जहाँ कोई खाश उपलब्द्धि नहीं होती क्योकि मूलाधार पृथ्वी तत्व होने के कारन अपने गुरुत्व में खिचता है उससे ऊपर उठाना होगा स्वाधिष्ठान में फस जाने से भी कोई भला नहीं होने वाला क्योकि इसमें प्रेम स्नेह ,संतान उत्पन्न तक ही सिमित है जिसे पशु भी करते है

जीवन का शुख मणिपुर चक्र के ऊपर है इसलिए "ई"रूपी सुषुम्ना शक्ति जो अचेत रूप में मूलाधार में पड़ा है उसे जगाना पड़ेगा और गुरु यही करता है "दीक्षा "के माध्यम से ,स्पर्श के माध्यम से और जब यह आगे बढ़ता है तब सम्पूर्ण आकाश (शब्द)का ज्ञान और प्रकृति के हर रहस्य अनाहत में खुलने लगते है इसके ऊपर विशुद्ध में मूर्त रूप लेकर साक्षात् वागेश्वरी कृपा प्राप्त हो जाता है और कंठ से मंत्र स्फुटित होने लगता है विशुद्ध ध्वनी निकलने लगती है इसके ऊपर ह्रदय मे शिव और शक्ति का हं और क्षम रूप में आज्ञा चक्र में भान होने लगता है तब ईकार शक्ति के जागरण से शव सामान यह जीवन शिवमय हो जाता है और यही शिवत्व गुरु प्रदान करते है ईष्ट का साक्षात्कार होने लगता है अपना जीवन सार्थक होने लगता है जिसे केवल नेति -नेति कहते है यही परमानन्द की प्राप्ति है



शनिवार, 17 अप्रैल 2010

गुरुसत्ता अध्यात्मिक केंद्र

गुरुसत्ता
संक्षिप्त विवरण :-
छत्तीसगढ़ राज्य के प्रयाग राज कमल क्षेत्र पद्मापुरी नगरी राजिम से पूर्व दिशा में १६ किलो मी दुरी पर गुरुसत्ता अध्यात्मिक केंद्र तरिघाट(राजिम )स्थित हैजहाँ चंकेश्वरी शक्तिपीठ की स्थापना की गई है भौगौलिक दृष्टीकोण से पूर्व में सरगी नदी (सरयू नदी)एवं आमराई से आन्छदित है पश्चिम में बहरा नार दक्षिण में उपजाऊ धरती तो वही उत्तर में महुआ वृक्षों का सघन प्राकृतिक सौंदर्य आन्छदित है
केंद्र की स्थापना १९८९-१९९० में संस्था के संचालक डाआनंद राम मतावले (गुरूजी )ने किया ग्राम तरिघाट सरयू नदी के घात के ऊपर बसा है वर्तमान में १६०० की जनसँख्या जिसमे सभी समाज के लोग निवासरत है
डा आनंद मतावले गुरूजी (संक्षिप्त परिचय ):-डा मतआवले जी का जन्म २० जुलाई १९६८ में एक संपन्न कृषक परिवार में हुआ पिता श्री घासीदास एवं माता श्रीमती सोनबती मतावले के तृतीय पुत्र परिवार के अन्य सदस्यों में सबसे विरले रहे है जन्म से ही उनमे विलक्षणता विद्यमान रही थी
शिक्षा -दीक्षा :-माध्यमिक शिक्षा स्थानीय स्तर पर एवं स्नातक ,बी .ई श्री गोविंद राम सक्सेरिया इंस्टिट्यूट टेक्नोलोजी इंदौर (मध्यप्रदेश )में हुआ बी .ई के तृतीय वर्ष में ही अचानक से आये घटनाक्रमों ने आध्यात्मिक क्षेत्र की ओर रुख मोड़ दिया
शिक्षा के उपरान्त ग्राम मारकाटोला कंकालिन में समाधिस्थ राजाराव के सूक्ष्म संम्प्रेशन से तंत्र ज्ञान लिया १९९४ में डा श्री नारायणदत्त माली (स्वामी निखिलेश्वर नन्द जी )से दीक्षा प्राप्त कर समाज सेवा एवं अध्यात्म में प्रवेश किया
साधना -सिद्धि :-६४ पूर्व शक्ति साधना के साथ विभिन्न कर्मकांडो के साथ षट्कर्म ,कुण्डलनी योग ,क्रिया योग जीवां मार्ग दर्शन ,महाविद्या आदि
संसथान की गतिविधिया :-
संसथान की स्थापना १९८९ में किया गया जहाँ आज भारतीय प्रंच्या गूढ़ विद्या एवं साबर तंत्र पर निरंतर शोध प्रक्रिया जारी है विभिन्न स्थानों पर छत्तीसगढ़ के अलावा ,उडीसा ,महाराष्ट्र ,हिमांचल आदि राज्यों में विशिष्ट शिविर के माध्यम से समाज सेवा में अग्रणी कार्य करते हुए आ रहे है
होली ,नवरात्रि ,दीपावली ,शिवरात्री एवं विशेष रूप से १८,१९जन्वरि को अन्नुराज जयंती जैसे कार्यक्रम आयोजित कर साधक ,शिष्यों को मार्गदर्शन करते है एवं केंद्र तरिघाट राजिम में प्रति बुधवार को प्रातः ७ बजे से दोपहर २बजे तक जन समस्याओ जैसे जीवन के विभिन्न जटिल समस्यों का निराकरण करते आ रहे है
कर्मकांड :-विशिष्ट गुरुपूजन ,तंत्र बाधा ,राजबाधा ,शत्रुबाधा निवारण एवं अनुष्ठान ,शांति कर्म ,गृहशांति ,कालसर्प व् अन्य अमंगल गतिविधिओ का अनुष्ठान के माध्यम से हल किया जाता है
अनुराज